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श्री राम जन्म भूमि राम मन्दिर के लिए दान कैसे करे?

 श्री राम जन्म भूमि राम मन्दिर के लिए दान कैसे करे?




भारत ( अयोध्या) में राम जन्म भूमि में बन रही श्री राम मन्दिर के लिए सभी लोग बड चड़ कर दान कर रहे हैं। जिससे भव्य मंदिर का निर्माण हो सकें। चाहे गरीब हो या अमीर सभी पुण्य के भागीदार बनें, जिस तरह  श्री राम जी के वनवास काल में चाहे वह वानर हो, भालू हो , गिलहरी , आदिवासी हो सभी ने यथा शक्ति सहयोग किए थे। 

सभी लोग दान करना चाहते है,अब सवाल यह उठता है, की दान करे तो करे कैसे करे? 

कोर्ट के बनाए श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट के एकाउंट सीधे आप दान कर सकते है या भीम एप के जरिए स्कैन कर भी दान कर सकते हैं।

आप अपनी यथा शक्ति 1/- रुपए से लाखो - करोड़ों तक दान कर सकते हैं, आयकर अधिनियम ( कानून) की धारा 80G (2) (B) के अंतर्गत करमुक्त है।

एकाउंट नाम:- SHREE RAM JANMBHOOI TEERTH KENDRA

सेविंग एकाउंट:- 39161495808

करंट एकाउंट:-  39161498809

IFSC कोड :- SBIN0002510

शाखा :- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अयोध्या 02510

PAN NO:- AAZTS6197B









और कोई भी एकाउंट में पैसा न डाले, आप के साथ धोखा हो सकता है। दान के नाम पर किसी के एकाउंट में पैसा न भेजे।

अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर के निर्माण में आर्थिक सहयोग कैसे कर सकते हैं ये जानने के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट व बैंकों ने टोल फ्री नंबर जारी कर दिया है। इन नंबरों पर फोन कर दान करने के लिए पूरी जानकारी ली जा सकती है।

स्टेट बैंक आफ इंडिया का टोल फ्री नंबर 18001805155

बता दें कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए निधि समर्पण अभियान की बीते शुक्रवार को शुरुआत हो गई। निधि समर्पण अभियान की पहली रसीद संत समाज को समर्पित की गई। विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए घर-घर जाकर चंदा जुटाने का लक्ष्य रखा है।

अधिक जनकारी के लिए:-वीडियो देखने के लिए किलीक करें।


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जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम



ब्रह्मचर्य - वीर्य रक्षण - योग-साधना

 ब्रह्मचर्य  - वीर्य रक्षण  - योग-साधना"।



1. वीर्य  के  बारें  में  जानकारी  - 


आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में सात धातु होते हैं- जिनमें अन्तिम धातु वीर्य (शुक्र) है। वीर्य ही मानव शरीर का सारतत्व है।

 40 बूंद रक्त से 1 बूंद वीर्य होता है।

 एक बार के वीर्य स्खलन से लगभग 15 ग्राम वीर्य का नाश होता है । जिस प्रकार पूरे गन्ने में शर्करा व्याप्त रहता है उसी प्रकार वीर्य पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहता है।


सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते है ।।

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2. वीर्य  को पानी  की  तरह   रोज बहा देने से नुकसान   - 


शरीर के अन्दर विद्यमान ‘वीर्य’ ही जीवन शक्ति का भण्डार है। 

शारीरिक एवं मानसिक दुराचर तथा प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक मैथुन से इसका क्षरण होता है। कामुक चिंतन से भी इसका नुकसान होता है। 


मैथून के द्वारा पूरे शरीर में मंथन चलता है और शरीर का सार तत्व कुछ ही समय में बाहर आ जाता है।

 रस निकाल लेने पर जैसे गन्ना छूंट हो जाता है कुछ वैसे ही स्थित वीर्यहीन मनुष्य की हो जाती है।  ऐसे मनुष्य की तुलना मणिहीन नाग से भी की जा सकती है। खोखला होता जाता  है  इन्सान ।


स्वामी शिवानंद जी ने मैथुन के  प्रकार बताए हैं जिनसे बचना ही ब्रह्मचर्य है -

 1. स्त्रियों को कामुक भाव से देखना।

 २.  सविलास की क्रीड़ा करना।

 3. स्त्री के रुप यौवन की प्रशंसा करना।

 4. तुष्टिकरण की कामना से स्त्री के निकट जाना। 

 5. क्रिया निवृत्ति अर्थात् वास्तविक रति क्रिया।

 

    इसके अतिरिक्त विकृत यौनाचार से भी वीर्य की भारी क्षति हो जाती है। हस्तक्रिया  आदि इसमें शामिल है।

 शरीर में व्याप्त वीर्य कामुक विचारों के चलते अपना स्थान छोडऩे लगते हैं और अन्तत: स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर आ जाता है।

 ब्रह्मचर्य का तात्पर्य वीर्य रक्षा से है। यह ध्यान रखने की बात है कि ब्रह्मचर्य शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार से होना जरूरी है। अविवाहित रहना मात्र ब्रह्मचर्य नहीं कहलाता। 

    धर्म कर्तव्य के रूप में सन्तानोत्पत्ति और बात है और कामुकता के फेर में पडक़र अंधाधुंध वीर्य नाश करना बिलकुल भिन्न है।


मैथुन क्रिया से होने वाले नुकसान निम्रानुसार है- 

* शरीर की जीवनी शक्ति घट जाती है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। 

* आँखो की रोशनी कम हो जाती है। 

* शारीरिक एवं मानसिक बल कमजोर हो जाता है। 

* जिस तरह जीने के लिये ऑक्सीजन चाहिए वैसे ही ‘निरोग’ रहने के लिये ‘वीर्य’। 

* ऑक्सीजन प्राणवायु है तो वीर्य जीवनी शक्ति है। 

* अधिक मैथुन से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाता  है। 

* चिंतन विकृत हो जाता है।


वीर्यक्षय से विशेषकर तरूणावस्था में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं -  


  चेहरे पर मुँहासे , नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखाएँ, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, दुर्बलता,  आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, शिरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्नदोष व मानसिक अशांति।


अगर ग्रुप  में  किसी  भाई  को ये समस्याएँ हैं  तो उपाय भी  लिख रहा हूँ  - 


लेटकर श्वास बाहर निकालें और अश्विनी मुद्रा अर्थात् 30-35 बार गुदाद्वार का आकुंचन-प्रसरण श्वास रोककर करें। 

ऐसे एक बार में 30-35 बार संकोचन विस्तरण करें। तीन चार बार श्वास रोकने में 100 से 120 बार हो जायेगा।

 यह ब्रह्मचर्य की रक्षा में खूब मदद करेगी। इससे व्यक्तित्व का विकास होगा ही,  व ये  रोग भी दूर होंगे समय के साथ ।।

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3. वीर्य  रक्षण  से  लाभ - 


शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव,  कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है।

ऐसे  व्यक्ति  को जल्दी  से कोई  रोग नहीं  होता है  उसमें  रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है  ।


पहले के जमाने में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। और  उस वक्त में  यहाँ वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए| 


ऋषि दयानंद ने कहा ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन करने बाले ब्यक्ति का अपरिमित शक्ति,  प्राप्त होता है एक ब्रह्मचारी संसार का जितना उपकार कर सकता है दूसरा कोई नही कर सकता. 


भगवान बुद्ध  ने कहा है -  ‘‘भोग और रोग साथी है और ब्रह्मचर्य आरोग्य का मूल है।’’


स्वामी रामतीर्थ  ने कहा है - ‘‘जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश  के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का वीर्य सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है।


पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन होने पर योगी पश्चाताप करता है।


भगवान शंकर ने  कहा  है- 

'इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान महिमा हुई है।'


कुछ  उपाय  - 


ब्रह्मचर्य जीवन जीने के लिये सबसे पहले ‘मन’ का साधने की आवश्यकता है। 

 भोजन पवित्र एवं सादा होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए। 

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1.   प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएँ। 

2.    तेज मिर्च मसालों से बचें। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन करें। 

3.    सभी नशीले पदार्थों से बचें। 

4.    गायत्री मन्त्र या अपने ईष्ट मन्त्र का जप व लेखन करें। 

5.    नित्य ध्यान (मेडिटेशन) का अभ्यास करें। 

6.    मन को खाली न छोड़ें किसी रचनात्मक कार्य व लक्ष्य से जोड़ रखें। 

7.    नित्य योगाभ्यास करें। निम्न आसन व प्राणायाम अनिवार्यत: करें-

आसन-पश्चिमोत्तासन, सर्वांगासन, भद्रासन प्राणायाम- भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम विलोम।


जो हम खाना खाते हैं उससे वीर्य बनने की काफी लम्बी प्रक्रिया है।खाना खाने के बाद रस बनता है जो कि नाडियों में चलता है।फिर बाद में खून बनता है।इस प्रकार से यह क्रम चलता है और अंत में वीर्य बनता है।

वीर्य में अनेक गुण होतें हैं।

 क्या आपने कभी यह सोचा है कि शेर इतना ताकतवर क्यों होता है?वह अपने जीवन में केवल एक बार बच्चॉ के लिये मैथुन करता है।जिस वजह से उसमें वीर्य बचा रहता है और वह इतना ताकतवर होता है।

 जो वीर्य इक्कठा होता है वह जरूरी नहीं है कि धारण क्षमता कम होने से वीर्य बाहर आ जायेगा।वीर्य जहाँ इक्कठा होता है वहाँ से वह नब्बे दिनों बाद पूरे शरीर में चला जाता है।

फिर उससे जो सुंदरता,शक्ति,रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि बढती हैं उसका कोई पारावार नहीं होता है।

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4.  पत्नी  का त्याग  नहीं  करना है -


ब्रह्मचर्य में स्त्री और पुरुष का कोई लेना देना ही नहीं है। 

प्राचीन काल में ऋषि मुनि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे, ऋषि पत्नियां भी बहुत जागृत और ग्यानी होती थी। आत्मसाक्षात्कार का जितना अधिकार पुरुषो को था उतना ही स्त्रियों को भी था। 

 ब्रह्मचर्य को पूर्ण गरिमा प्राचीन काल में ही मिली थी। मैंने एक कथा सुनी थी, एक ऋषि ने अपने पुत्र को दुसरे ऋषि के पास सन्देश लेकर भेजा था, पुत्र ने पिता से कहा की राह में एक नदी पड़ती है, कैसे पार करूँगा।

 ऋषि ने कहा जाकर नदी से कहना,अगर मेरे पिता ने एक पल भी ब्रह्मचर्य का व्रत ना त्यागा हो, स्वप्न में भी नहीं, तो हे नदी तू मुझे रास्ता दे दे। 

कथा कहती है की नदी ने रास्ता दे दिया। कैसा विरोधाभास है, एक पुत्र का पिता और ब्रह्मचारी , कैसे ? 

जाहिर  है  कि संभोग एक बार  सन्तानोपत्ति  के  लिए  किया गया था , आनंद के लिए  नहीं  ।

बुद्ध और महावीर के बाद हज़ारों युवक अपनी पत्नियों को घर को छोड़ कर भिक्षु बन गए , तब ब्रह्मचर्य का अर्थ सिर्फ स्त्री निषेध बन गया। 

।

नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग के बिना सृष्टि का व्यवस्थाक्रम नहीं चल सकता।

 दोनों का मिलन कामतृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु प्रयोजन के लिए नहीं होता, वरन घर बसाने से लेकर व्यक्तियों के विकास और सामाजिक प्रगति तक समस्त सत्प्रवित्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही सम्भव होता है। 

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अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि नारी ही दोष दुर्गुणों की, पाप-पतन की जड़ है। 

इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।

 इस सनक में लोग घर छोडक़र भागने में, स्त्री बच्चे को बिलखता छोडक़र भीख माँगने और दर-दर भटकने के लिए निकल पड़े।

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तंत्र के पथिको ने आज्ञा चक्र में अर्ध नारीश्वर की कल्पना की है, यह कल्पना नहीं यथार्थ है, विज्ञान भी स्वीकारता है, की, हर स्त्री में एक पुरुष विद्यमान है और हर पुरुष में एक स्त्री। 


जब साधक या साधिका की चेतना आज्ञा चक्र में प्रवेश करती है, जब कुण्डलिनी आज्ञा चक्र का भेदन करती है तो काम ऊर्जा राम ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है, साधक जीव संज्ञा से शिव संज्ञा में प्रविष्ट हो जाता है।

 आज्ञा चक्र में पुरुष साधक को अपने भीतर की स्त्री का दर्शन होता है और स्त्री साधक को अपने भीतर के पुरुष का, जैसे ही यह दर्शन मिलता है, वैसे ही बाहर की स्त्री या पुरुष विलीन हो जाता है, खो जाता है।

 बाहर की स्त्री या पुरुष में रस ख़त्म हो जाता है, आप अपने भीतर के पुरुष या स्त्री को पा लेते हैं, और साथ ही आप आतंरिक या आध्यात्मिक सम्भोग के रहस्य को जान लेते हैं, जो पंचमकार का एक सूक्ष्म मकार है। 

यह बिलकुल उसी तरह होता है , जैसे खेचरी मुद्रा में साधक ललना चक्र से टपकने वाली मदिरा का पान करके आनंद में रहता है। जैसे ही आपको भीतर का सौंदर्य मिलता है, बाहर का सौंदर्य खो जाता है ।

संसार की स्त्री या पुरुष में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है, कोई रस नहीं रह जाता है, यही वो घडी है, जब ब्रह्मचर्य आपके भीतर से प्रस्फूटित होता है. अब आप वो नहीं रहे आप रूपांतरित हो जाते हैं, यही वो जगह है जहाँ शिवत्व घटता है ।  


5.  कमेन्टस  में   चर्चा   -


एक बात  ध्यान  रखना है  चर्चा  में  कि यहाँ  माता-बहने  भी  हैं  तो शब्दों  का ख्याल  रखना है  ,  कामुक या गंदे  शब्दों  से परहेज  करना है  जहां  तक हो सके । 


शादीशुदा व्यक्ति पूर्ण  ब्रह्मचर्य  ना रख सकें  तो भी  संयमित  जीवन  अवश्य  व्यतीत  करना चाहिए  ।


अगर कोई  कहता है  कि  यौन इच्छाओं  को दबाने  से नपुंसकता  आ जाएगी  या  दबाने  से अच्छा  है  भोग लो ,  तो  भाई  ऐसा  है  कि उपर  लिखी  दिनचर्या  अपनाओगे तो यौन इच्छाएँ  पैदा  ही  नहीं  होगी  ,

मन निर्मल  तो तन निर्मल  ।। 


अगर  कोई  कहे  कि  संभोग    8-10  दिन  इतना ज्यादा  करो  कि घृणा  हो जाए , तो भाई  ऐसा  है  कि  नसें उभर आएंगी  , पीड़ा  भी  महसूस  करोगे , संभोग  से  मन उचट भी  जाएगा ,  परन्तु  .....

महिने 2-3   में  वीर्य  बनने पर ,  कामुक  साहित्य  , नेट पर अशलील चीजें  देखने पर , नारी  को गलत भावना  से देखने पर फिर  से काम वेग उठेगा , तुम फिर  बह जाओगे।


इसलिए  ये  सोचना  बिल्कुल  गलत होगा कि  8-10  दिन  जमकर करो तो घृणा  हो जाएगी  सदा के लिए । ।


साधना पर भी  प्रभाव  पडेगा  ,  जो व्यक्ति  कामुक है  ,  उसके  विचार  भी  वैसे  चलेंगे  ,  ज्यादा  वीर्य  नष्ट  करने  से  शरीर  में  शक्ति  का संचार कम होगा ,  वह  1 घण्टे  तक  ज्ञान मुद्रा  में  ही  नहीं  बैठ पाएगा  ।

जनेऊ

  



जनेऊ का नाम सुनते ही सबसे पहले जो चीज़ मन मे आती है वो है धागा दूसरी चीज है ब्राम्हण ।। जनेऊ का संबंध क्या सिर्फ ब्राम्हण से है , ये जनेऊ पहनाए क्यों है , क्या इसका कोई लाभ है, जनेऊ क्या ,क्यों ,कैसे आज आपका परिचय इससे ही करवाते है ----


जनेऊ_को_उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है ।।


हिन्दू धर्म के 24 संस्कारों में से एक ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ही जनेऊ पहनी जाती है जिसे ‘यज्ञोपवीतधारण करने वाले व्यक्ति को सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है "सन्निकट ले जाना" और उपनयन संस्कार का अर्थ है --

"ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना"


हिन्दू_धर्म_में प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है जनेऊ पहनना और उसके नियमों का पालन करना। हर हिन्दू जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे। ब्राह्मण ही नहीं हिन्दू समाज का हर वर्ग जनेऊ धारण कर सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। मतलब सीधा है जनेऊ संस्कार के बाद ही शिक्षा का अधिकार मिलता था ।।


लड़की_जिसे_आजीवन_ब्रह्मचर्य का पालन करना हो, वह जनेऊ धारण कर सकती है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित छह धागों की जनेऊ पहनता है। यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाए गए हैं।


जनेऊ_का_आध्यात्मिक_महत्व -- 


जनेऊ_में_तीन-सूत्र –  त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक – देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक – सत्व, रज और तम के प्रतीक होते है। साथ ही ये तीन सूत्र गायत्री मंत्र के तीन चरणों के प्रतीक है तो तीन आश्रमों के प्रतीक भी। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। अत: कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। इनमे एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं। इनका मतलब है – हम मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। ये पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के भी प्रतीक है।


जनेऊ_की_लंबाई : जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है क्यूंकि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर होती है। 64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि आती हैं।


जनेऊ_के_लाभ -- 


प्रत्यक्ष_लाभ जो आज के लोग समझते है - 


"जनेऊ बाएं कंधे से दाये कमर पर पहनना चाहिये"।


जनेऊ_में_नियम_है_कि - 

मल-मूत्र विसर्जन के दौरान जनेऊ को दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका मूल भाव यह है कि जनेऊ कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। यह बेहद जरूरी होता है।


मतलब साफ है कि जनेऊ पहनने वाला व्यक्ति ये ध्यान रखता है कि मलमूत्र करने के बाद खुद को साफ करना है इससे उसको इंफेक्शन का खतरा कम से कम हो जाता है 


वो_लाभ_जो_अप्रत्यक्ष_है जिसे कम लोग जानते है -


शरीर में कुल 365 एनर्जी पॉइंट होते हैं। अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग पॉइंट असर करते हैं। कुछ पॉइंट कॉमन भी होते हैं। एक्युप्रेशर में हर पॉइंट को दो-तीन मिनट दबाना होता है। और जनेऊ से हम यही काम करते है उस प्वाइंट को हम एक्युप्रेश करते है ।।

 कैसे आइये समझते है 


कान_के_नीचे_वाले_हिस्से (इयर लोब) की रोजाना पांच मिनट मसाज करने से याददाश्त बेहतर होती है। यह टिप पढ़नेवाले बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है।अगर भूख कम करनी है तो खाने से आधा घंटा पहले कान के बाहर छोटेवाले हिस्से (ट्राइगस) को दो मिनट उंगली से दबाएं। भूख कम लगेगी। यहीं पर प्यास का भी पॉइंट होता है। निर्जला व्रत में लोग इसे दबाएं तो प्यास कम लगेगी।


इसके अलावा इसके कुछ अन्य लाभ जो क्लीनिकली प्रोव है - 


1. बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से ऐसे स्वप्न नहीं आते।


2. जनेऊ_के हृदय के पास से गुजरने से यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है, क्योंकि इससे रक्त संचार सुचारू रूप से संचालित होने लगता है।


3. जनेऊ_पहनने वाला व्यक्ति सफाई नियमों में बंधा होता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जीवाणुओं के रोगों से बचाती है।


4. जनेऊ_को_दायें कान पर धारण करने से कान की वह नस दबती है, जिससे मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करती है।


5. दाएं_कान_की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।


6. कान_में_जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है।


7. कान_पर_जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

।।साभार।।

छोटी छोटी खुशियाँ बाँटे ,( लघु कथा)

 


बहुत दिनो से #Pleasure🛵 गाडी का उपयोग नही होने से, वह पडी पडी खराब होने जैसी स्थिति में पहुंच रही थी। 

विचार आया Olx पे बेच दे

Add डाला किमत *Rs 30000/-


बहुत आफर आये 15 से 28 हजार तक। 

मुझे लगा यदि 28 मिल रहे तो, कोई 29-30 देगा भी।

एक का 29 का प्रस्ताव आया। 

उसे भी waiting में रखा।


एक सुबह काल आया, उसने कहा-

*साहब नमस्कार 🙏 , आपकी गाडी का add देखा। पसंद भी आयी है। परंतु  30 जमाने का बहुत प्रयत्न किया, 24 ही इकठ्ठा कर पाया हूँ। बेटा इंजिनियरिंग के अंतिम वर्ष में है। बहुत मेहनत किया है उसने। कभी पैदल, कभी सायकल, कभी बस, कभी किसी के साथ। सोचा अंतिम वर्ष तो वह अपनी गाडी से ही जाये। आप कृपया  Pleasure 🛵 मुझे ही दिजीएगा। नयी गाडी दुगनी किमत से भी ज्यादा है। मेरी हैसियत से बहुत ज्यादा है। थोडा समय दिजीए। मै पैसो का इंतजाम करता हूँ। मोबाइल बेच कर कुछ रुपये मिलेंगें। परंतु हाथ जोड़कर कर  निवेदन है साहब, Pleasure मुझे ही दिजीएगा।


मैने औपचारिकता में मात्र Ok 👌 बोलकर फोन रख दिया। 


कुछ विचार मन में आये। 

वापस काल बैक किया और कहा आप अपना मोबाइल मत बेचिए, कल सुबह केवल 24 हजार  लेकर आईए, गाडी आप  ही ले जाईए वह भी मात्र 24 में ही


मेरे पास 29 का प्रस्ताव होने पर भी 24 में किसी अपरिचित व्यक्ति को मै Pleasure🛵 देने जा रहा था। 

सोचा उस परिवार में आज कितने Pleasure🛵 या आनंद का निर्माण हुआ होगा। 

कल उनके घर Pleasure🛵 आएगी। 

और मुझे ज्यादा नुकसान भी नहीं हो रहा था।

ईश्वर ने बहुत दिया है और सबसे बडा धन #समाधान है जो कूट-कूटकर दिया है। 


अगली सुबह उसने कम से कम 6-7 बार फोन किया  साहब कितने बजे आऊ, आपका समय तो नही खराब होगा। पक्का लेने आऊं, बेटे को लेकर या अकेले आऊ। पर साहब Pleasure🛵 गाडी किसी को और नही दिजीएगा।


वह 2000, 500, 200, 100, 50 के नोटों का संग्रह लेकर आया, साथ में बेटा भी था। ऐसा लगा, पता नही कहा कहा से निकाल कर या मांग कर या इकठ्ठा कर यह पैसे लाया है।  


बेटा एकदम आतुरता और कृतज्ञता से Pleasure🛵 को देख रहा था। मैने उसे दोनो चाबियां दी, कागज दिये। बेटा गाडी पर विनम्रतापूर्वक हाथ फेर रहा था। रुमाल निकास कर पोछ रहा था। 


उसनें पैसे गिनने कहा, मैने कहा आप गिनकर ही लाये है, कोई दिक्कत नहीं।

जब जाने लगे, तो मैने उन्हे 500 का एक नोट वापस करते कहाँ, घर जाते मिठाई लेते जाएगा। सोच यह थी कि कही तेल के पैसे है या नही। और यदि है तो मिठाई और तेल दोनो इसमें आ जायेंगें। 


आँखों  में कृतज्ञता के आंसु लिये उसने हमसे विदा ली और अपनी Pleasure🛵 ले गया। जाते समय बहुत ही आतुरता और विनम्रता से झुककर अभिवादन किया। बार बार आभार व्यक्त किया।


हम लोग सहज भाव में कहते है it's my pleasure

परंतु आज Pleasure🛵 बेचते समय ही पता चला कि वास्तव में  #Pleasure  होता क्या है। 


जीवन में कुछ व्यवहार करते समय नफा नुकसान नहीं देखना चाहिए। 

अपने माध्यम से किसी को क्या सचमें कुछ आनंद प्राप्त हुआ यह देखना भी होता है।

 

करबद्ध निवेदन है कि ईश्वर ने आपको कुछ देने लायक बनाया हो या नही,

किसी एक व्यक्ति को सुख देने या खुशी देने लायक तो बनाया ही है। 

आज सब्जी वाली किसी बुजुर्ग महिला या पुरुष को अपनी ओर से केवल 5 या 10 रुपये अधिक देकर देखिएगा, 

वही #Pleasure न आये तो कहना। 



#जयजयभारत

Har har mahadev

 मेरे समूह से साभार 



एक मशहूर धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए गए। जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला, जिसमें एक शिवलिंग था। थिम्मन के मन में शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और उन्होंने वहां कुछ अर्पण करना चाहा। लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें। उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस शिवलिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया।


उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालांकि वह शिव का भक्‍त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह सिर्फ पंद्रह दिनों में एक बार आता था। अगले दिन जब ब्राह्मण वहां पहुंचा, तो शिव लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्‍का रह गया। यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा, उसने मंदिर की सफाई कर दी, अपनी पूजा की और चला गया। अगले दिन, थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। एक दिन उन्हें लगा कि शिवलिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी शिवलिंग पर डाल दिया।


जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और शिवलिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, शिवलिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे शिवलिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।” शिव ने जवाब दिया, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं। अगर तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो, तो पास में कहीं जा कर छिप जाओ और देखो। वह आने ही वाला है। ”ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिव हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे। वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आंख से कुछ रिस रहा है। उसने उस आंख में जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्‍त आने लगा। आखिरकार, उसने अपनी आंख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आंख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की सांस ली।

 लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आंख से भी रक्‍त निकल रहा है। उसने तत्काल अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया, लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आंख को कहां रखना है। तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आंख निकाल ली। उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया। उसे कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आंखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।

हर हर महादेव 🔱🕉️

दिशाशूल

 


दिशाशूल क्या होता है ? इसके बारे मे सम्पूर्ण जानकारी

 

दिशाशूल क्या होता है ? क्यों बड़े बुजुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक टोक करते हैं ? आज की युवा पीढ़ी भले हि उन्हें आउटडेटेड कहे ..लेकिन बड़े सदा बड़े हि रहते हैं ..इसलिए आदर करे उनकी बातों का ;दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है| हम सबने पढ़ा है कि दिशाएं ४ होती हैं |१) पूर्व२) पश्चिम३) उत्तर४) दक्षिण

 

परन्तु जब हम उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं तो ज्ञात होता है कि वास्तव मेंदिशाएँ दस होती हैं |१) पूर्व२) पश्चिम३) उत्तर४) दक्षिण५) उत्तर - पूर्व६) उत्तर - पश्चिम७) दक्षिण – पूर्व८) दक्षिण – पश्चिम९) आकाश१०) पातालहमारे सनातन धर्म के ग्रंथो में सदैव १० दिशाओं का ही वर्णन किया गया है,जैसे हनुमान जी ने युद्ध इतनी आवाज की किउनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाईदी | हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं |

 

दसों दिशाओं को समझने के पश्चात अब हम बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की |ज्योतिष शब्द “ज्योति” से बना है जिसका भावार्थ होता है “प्रकाश” |वैदिक ज्योतिष में अत्यंत विस्तृत रूप में मनुष्य के जीवन की हरपरिस्तिथियों से सम्बन्धित विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य यदि इसको तनिकभी समझले तो वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली बहुत सी समस्याओं से बचसकता है और अपना जीवन सुखी बना सकता है |


दिशाशूल क्या होता है ?

 दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करनाचाहिए | हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है |

१) सोमवार और शनिवार को पूर्व

२) रविवार और शुक्रवार को पश्चिम

३) मंगलवार और बुधवार को उत्तर

४) गुरूवार को दक्षिण

५) सोमवार और गुरूवार को दक्षिण-पूर्व

६) रविवार और शुक्रवार को दक्षिण-पश्चिम

७) मंगलवार को उत्तर-पश्चिम

८) बुधवार और शनिवार को उत्तर-पूर्व


परन्तु यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशामें दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है | परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्यहो ओर उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी पड़े, जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो यहउपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए 

रविवार – दलिया और घी खाकर

सोमवार – दर्पण देख कर

मंगलवार – गुड़ खा कर

बुधवार – तिल, धनिया खा कर

गुरूवार – दही खा कर

शुक्रवार – जौ खा कर

शनिवार – अदरक अथवा उड़द की दाल खा कर

साधारणतया दिशाशूल का इतना विचार नहीं किया जाता परन्तु यदि व्यक्ति केजीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्तिमार्ग में आने वाली बाधाओं से बच सकता है | आशा करते हैं कि आपके जीवनमें भी यह ज्ञान उपयोगी सिद्ध होगा तथा आप इसका लाभ उठाकर अपने दैनिक जीवनमें सफलता प्राप्त करेंगे |


Sab kuch

मूलाधार चक्र हीलिंग।

  https://youtu.be/APq3mCgb3fM?si=D1nkuyqimWfZXSyp ये वीडियो जरूर देखें, मूलाधार चक्र हीलिंग का है ,रात को सोने से पहले जरूर देखें बहुत पावर...