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समाधि

    


जब साधक सद्गुरु की कृपा से साधना, ध्यान अभ्यास पूर्ण कर समाधि योग्य हो जाता है, बाहरी विचारों से मुक्त होकर अंतर्मुखी हो जाता है तथा वह अपनी आत्मा में ही लीन रहता है तो समाधि घटित होती है । 


जब साधक ध्यान में बैठता है तो कुछ समय पश्चात उसे एक मौन जैसी अवस्था प्राप्त होती है । यहाँ उसे बेचैनी और उदासी सी अनुभव होती है । यहाँ पर साधक को अपने विचारों पर अधिक ध्यान नही देना चाहिए । विचार आ रहे है तो आने दो, जा रहे हैं तो जाने दो, बस दृष्टा बने रहो, एक पैनी नज़र के साथ । यहाँ साधक को धैर्य बनाए रखना चाहिए । इस मौन और उदासी के बाद ही हृदय प्रकाश से भरने लगता है । ध्यान में शरीरी भाव खोने लगेगा लेकिन साधक को इससे डरना नहीं चाहिए बल्कि खुश होना चाहिए कि वह परमात्मा प्राप्ति के मार्ग की और अग्रसर हो रहा है । अब साधक को ब्रह्म भाव की अनुभूति होने लगेगी । शरीर में विद्युत ऊर्जा का संचार होने लगेगा । इससे कभी कभी साधक के सिर में दर्द हो सकता है और यह बहुत ज्यादा भी हो सकता है । पीड़ा या दर्द यदि अधिक बढ़े तो चिंता नहीं करना चाहिए क्योंकि जब चक्र टूटते है तो पीड़ा होती ही है क्योंकि चक्र आदि काल से सोये पड़े हैं । अत: इस पीड़ा को शुभ मानना चाहिए । 


साधक के शरीर में या मस्तिष्क में झटते लग सकते है । कभी कभी शरीर कांपने लगता है लेकिन साधक को इस स्थिति से डरना नहीं चाहिए । कभी कभी शरीर में दर्द होगा और चला जाएगा । इसको भी दृष्टा भाव से देखते रहना क्योंकि यह भी अपना काम करके चला जाएगा । ध्यान में डटे रहना । यह कुंडलनी जागरण के चिह्न हैं, शरीर में विद्युत तेजी से चलती है । फिर धीरे धीरे अलौकिक अनुभव होने लगते है । शरीर तथा आत्मा आनंद से भरपूर हो जाती हैं । यहाँ साधक को चाहिए कि अपना कर्ता भाव पूर्ण रूप से छोडकर बस देखता रहे जैसे कोई नाटक देखता है । 


अब ऊर्जा उर्द्धगामी हो जाती है । यदि आपका तीसरा नेत्र अर्थात शिवनेत्र नहीं खुला है तो चिंता नहीं करना क्योंकि परमात्मा प्राप्ति की यात्रा के लिए यह जरूरी भी नहीं है । उच्चस्थिति आने पर यह स्वत: ही खुल जाता है । समय से पूर्व शक्ति का खुल जाना भी हानिप्रद हो सकता है । अब यह समझिए कि बीज अंकुरित हो चुका है अत: साधना में धैर्य रखते चलना । यह धैर्य ही ध्यान समाधि के रास्ते में खाद का कार्य करता है । अध्यात्म के अनुभवों का बुद्धि के आधार पर विश्लेषण न करना । क्योंकि ध्यान में तरक्की कुछ इस ढंग से होती रहती है जैसे मिट्टी में दबा बीज अंकुरित होता रहता है लेकिन अंकुरण की तरक्की का पता जब चलता है जब वह धरती की सतह से ऊपर आ जाता है । इस प्रकार धीरे धीरे साधक ( ध्याता ) ध्यान द्वारा ध्येय में पूर्णरूपेण लय हो जाता है और उसमें द्वैतभाव नहीं रहता है ऐसी अवस्था में समाधि लगती है । समाधि प्राप्त साधक दिव्य ज्योति एवं अद्भुद ताकत से पूर्ण हो जाता है । समाधि प्राप्त साधक सभी जीवों में  SHIV का वास देखने लगता है।


किसी की आज्ञा कभी मत मानो जब तक कि वह स्वयं की ही आज्ञा न हो। 

(सहज समाधि भली) 

जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है।  सत्य स्वयं में है, इसलिए उसे और कहीं मत खोजना।  प्रेम प्रार्थना है। 

शून्य होना सत्य का द्वार है; शून्यता ही साधन है, साध्य जीवन है, अभी और यहीं। जीओ--जागे हुए।  तैरो मत, बहो। मरो प्रतिक्षण, ताकि प्रतिपल नए हो सको। खोजो मत, जो है--है, रुको और देखो। 


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वितर्कानुगम समाधि

वितर्क :- जहाँ मन में सत्य को जानने के लिए और संसार को देखने के लिए एक विशेष तर्क होता है।

तीन तरह के तर्क हो सकते है - तर्क, कुतर्क, वितर्क।

कुतर्क का अर्थ है गलत तर्क, जिस में आशय ही गलत होता है। ऐसी स्थिति में तर्क लगाने का एकमात्र उद्देश्य दूसरे में गलती  निकालना होता है, तुम्हें  अपने भीतर पता होता है कि यह बात सही नहीं है, फिर भी तर्क के द्वारा तुम उस बात को सही सिद्ध कर देते हो। उदाहरणतः आधे दरवाज़े के खुले रहने का अर्थ है आधे दरवाज़े का बंद रहना; इसलिए पूरे दरवाज़े के खुले रहने का अर्थ है पूरे दरवाज़े का बंद होना! भगवान प्रेम हैं, और प्रेम अंधा होता है; इसलिए, भगवान अंधे हैं!

वितर्क एक विशेष तरह का  तर्क होते हैं, अभी जैसे हम तार्किक रूप से वैराग्य को समझ रहे थे पर ऐसे सुनने समझने की चेतना में प्रभाव हो रहा था, ऐसे विशेष तर्क से चेतना उठी हुई है, तुम एक अलग अवस्था में हो, यही समाधि है।  

समाधि का अर्थ है समता,'धी' अर्थात बुद्धि, चेतना का वह हिस्सा जिससे तुम समझते हो। जैसे अभी हम सभी समाधि की अवस्था में  हैं, हम एक विशेष तर्क से चेतना को समझ रहे हैं।  

तर्क किसी भी तरह से पलट सकता है, तुम तर्क को इस तरफ या दूसरी तरफ, कहीं भी रख सकते हो, तर्क का कोई भरोसा नहीं होता। परन्तु वितर्क को पलटा नहीं जा सकता है।  

जैसे किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और तुम वहां खड़े हो, मान लो की तुम उनसे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़े हो, अभी तुम्हें  पता है कि इस व्यक्ति का जीवन अब नहीं है और यह अंतिम सत्य है। ऐसे क्षण में तुम्हारी चेतना एक अलग अवस्था में होती है।  

जैसे कोई फिल्म जब समाप्त होती है तब कुछ समाप्त हो जाने का भाव रहता है, जब लोग किसी सिनेमाघर से बाहर निकलते  हैं, तुम देखोगे वहां सभी एक जैसी चेतना की अवस्था से बाहर आते हैं। ऐसे ही किसी संगीत समारोह से जब लोग बाहर आते हैं तो उन सभी में एक भाव रहता है कि कुछ समाप्त हो गया है। एक शिविर के समाप्त होने पर भी लोग एक चेतना की अवस्था, कि सब समाप्त हो गया है,ऐसे लौटते है।  

ऐसे क्षण में मन में एक विशेष तर्क होता है, एक अकाट्य तर्क, जो तुम्हारी चेतना में स्वतः ही आ जाता है। सब कुछ बदल रहा है, बदलने के लिए ही है। सब समाप्त हो जाना है, ऐसे वितर्क चेतना को उठा देती है। इसके लिए आँखें बंद करके बैठने की भी आवश्यकता नहीं, आँखें खुली हो तब भी 'मैं चेतना हूँ' ऐसा भाव और सब कुछ खाली है, तरल है। यह पूरा संसार एक क्वांटम मैकेनिकल फील्ड हैं, जो भी है- यह वितर्क है।  

सम्पूर्ण विज्ञान तर्क पर आधारित होता है, संसार का एक क्वांटम फील्ड होना अकाट्य वितर्क है,ऐसी अवस्था वितर्कानुगम समाधि है।

विचारानुगम समाधि

विचार में सभी अनुभव आ जाते हैं, सूंघना, देखना, दृश्य, सुनना - जो भी तुम ध्यान के दौरान देखने, सुनने आदि  का अनुभव करते हो, वह सभी विचारानुगम समाधि है, विचारों के सभी अनुभव और विचारों के आवागमन को देखना, सभी इसी में आते है।  

इस समाधि में विचारों की दो अवस्थाएं हो सकती है-

पहले तरह के विचार तुम्हें  परेशान करते हैं।  

दूसरी तरह के विचार तुम्हें  परेशान नहीं करते हैं परन्तु तुम्हारी चेतना में घूमते रहते हैं और तुम उनके लिए सजग भी होते हो। तुम समाधि में होते हो, समता में होते हो, पर उसी समय  विचार भी आते जाते रहते हैं, यह ध्यान का हिस्सा है। विचार और अनुभव बने रहते हैं, यह विचारानुगम समाधि है।

आनन्दानुगम समाधि

आनन्दानुगम समाधि अर्थात आनंद की अवस्था, जैसे कभी तुम सुदर्शन क्रिया करके उठते हो या सत्संग में भजन गाते हुए आनंदित हो उठते हो, तब मन एक अलग आनंद की अवस्था में होता है। ऐसे में चेतना उठी हुई होती है, पर आनंद होता है। ध्यान की ऐसी आनंदपूर्ण अवस्था आनन्दानुगम समाधि है।

आनंद में जो समाधि रहती है वह आनन्दानुगम समाधि है, यह भी एक ध्यानस्थ अवस्था है। ऐसे ही विचारानुगम समाधि में तुम कुछ आते जाते अनुभव, भावों और विचारों के साथ होते हो। जब तुम एक अकाट्य वितर्क के साथ समाधिस्थ होते हो तब वह वितर्कानुगम समाधि है।  

अस्मितानुगम समाधि

इनके उपरान्त चौथी समाधि है, अस्मितानुगम समाधि, यह ध्यान की बहुत गहरी अवस्था है। इसमें  तुम्हें  कुछ पता नहीं रहता है, केवल अपने होने का भान रहता है। तुम्हें  बस यह पता होता है कि तुम हो, पर यह नहीं पता होता की तुम क्या हो, कहाँ हो, कौन हो।  

केवल स्वयं के होने का भान रहता है, अस्मिता- मैं हूँ, इसके अलावा कुछ और नहीं पता होता है। यह समाधि की चौथी अवस्था है, अस्मितानुगम समाधि।  

इन चारों समाधि की अवस्थाओं को सम्प्रज्ञाता कहते हैं, अर्थात इन सभी में चेतना का प्रवाह होता है,जागरूकता का प्रवाह होता है।


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आत्मानुभव

 

                                                               


आत्मज्ञानही परमात्मा का ज्ञान है प्रत्येक व्यक्ति शरीर नही आत्मा है इसलिए परमात्मा भी वही है इसी कार ण आत्मज्ञान होने पर वह,, अहं ब्रह्मसिम,, कह सकता हैa किन्तु उसका अहंकार शेष है तो वह ऐसा नही कह सकता। 

अहंकारके कारण ही वह जीवात्मा और ईश्वर मे भेद देखता है।

उसेद्वैत ही दिखाई देता है।

तब वह''ईश्वर  पुत्र''  कहता है । यह भिन्नता जीवात्मा के तल  तक  की है। शुद्ध आत्मा और ईश्वर मे भिन्नता नही है।

आत्मज्ञानके बाद उके सभी कार्य नाटक  की भाति होते रहते है जिनसे अलग रहकर दृष्टा मात्र हो i होता है। नैतिकता का सम्बन्ध मन तक ही सिमित  है कि उसे बुराई से बचा ले।h धर्म इस मन के पार  की अवस्था है आत्मज्ञान से ही मुक्ति होती है। नियम संयम भी मन तक ही है आत्मज्ञान पर मनुष्य-  कृत नही, ईश्वरीय नियम ही महत्त्वपूर्ण हो जाते है। शास्त्र पढ़ने,कर्म एवं आचरण से ज्ञान नही होता है स्वमं देखने से मिल ता है ऐसे ज्ञान कीअभिव्यक्ति भी नही होती ।आत्मा के उपरजमी धूलि को झाडे़ बिना आत्मानुभव सम्भव नही। आत्मज्ञान में मृत्यु का अनुरूप होता है तभी अमृत की उपलब्धि होती हैo मृत्यु से ही नया  जीवन मिल ता है पुराने  कोढोनो से क्या नया मिल  सकता है नये  के लिये पुराने का त्याग  करना आवश्यक  है

आत्मानुभुति के समय वह स्वम  को शरीर से भिन्न देख लेता है तभी उसको प्रतीति  होती है कि मैशरीर नही आत्मा हूँ।तभी उसे अमृतत्त्व का अनुभव होता है

धर्मचेतना से जुडा़  हुआ शास्त्र है दर्शन की यहाँ गति  नही है  ,दर्शन जानने वाला धर्म को उपलब्ध नही हो सकता।

यही शाश्वत सत्य है


नमः   शिवाय  l

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 कृपा  जब   मिलती है  जब जीवन  मे कोई  संत आता है ..वो आपसे कुछ लेने नही आता ..सिर्फ  देने आता है ,ये तो  मूर्खता  की बात लोंग   सोचते  है  कि  मैं   इसको   क्या  दे दू ...वो तो  तुम सोभाग्यशाली हो यदि पर्मात्मा तुम्हारे मन  मे कोई प्रेरणा  लगाये की तुम भी ऐसमे भगीदार बनो इस  पुण्य कार्य मे .तो  तुम  बड़े  सो भाग्यशाली हो .तो वो उसकी  जब कृपा   होती है . उससे  वो शक्ति   जाग्रत  होती है ..  वो शक्ति ऊपर  उठती   है  तो संचित  कर्म  सुषुम्मना नाडी मेँ , त्मो  गुणी  कर्म   निचले  भाग  मे ,रजो  गुनी  कर्म मध्य  भाग  मे  ,ओर  सतोगुनी  कर्म  ऊपर  के भाग  मे ,होते है . ओर वो शक्ति जब साधना  जब वो प्रारम्भ  करता है .शक्ति ऊपर  उठती  है.ओर उन  सचित कर्मो  का भक्षण करती  हुई , संहार  करती हुई  ऊपर  उठी है  जैसे जैसे  शक्ति ऊपर उठती  है . वो संचित  कर्म  समाप्त  होते  जाते  है  ओर  वो जो  है आकर के  कुण्डलनी   शक्ति मे परीवर्तित   होकर के  भगवान  परात्पर शिव  के  साथ  जब मिलां होता  है ..तब  उस   अद्वत श्री  विध्या  के  साधक  को    ब्रहम  ग्यान  की प्राप्ती होती  है .. 

हनुमान चालीसा और हमारा दिनचर्या

 

कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री *हनुमान चालीसा* में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।


माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से 

पूर्व किया था

हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।


अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी  के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं। 


हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। 


हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….


*शुरुआत गुरु से…*


हनुमान चालीसा की शुरुआत *गुरु* से हुई है…


श्रीगुरु चरन सरोज रज, 

निज मनु मुकुरु सुधारि।


*अर्थ* - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं।


गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है। जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता। गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं। 


इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूं। आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी। माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है। 


समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है। अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।


*ड्रेसअप का रखें ख्याल…*


चालीसा की चौपाई है


कंचन बरन बिराज सुबेसा, 

कानन कुंडल कुंचित केसा।


*अर्थ* - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।


आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं। फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए। 


अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।


आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...


*सिर्फ डिग्री काम नहीं आती*


बिद्यावान गुनी अति चातुर, 

राम काज करिबे को आतुर।


*अर्थ* - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं। राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।


आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है। लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे। विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।


*अच्छा लिसनर बनें*


प्रभु चरित सुनिबे को रसिया, 

राम लखन सीता मन बसिया।


*अर्थ* -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।

जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए। 


अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है। अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।


*कहां, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है*


सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा।


*अर्थ* - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए। और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।


कब, कहां, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है। 


सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया। 


अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।


*अच्छे सलाहकार बनें*


तुम्हरो मंत्र बिभीसन माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना।


*अर्थ* - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।


हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले। विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी। 


विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए। किसको, कहां, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है। सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुंचाती है।


*आत्मविश्वास की कमी ना हो*


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।


*अर्थ* - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।


अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं। 


आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है। अपनेआप पर पूरा भरोसा रखे


        जय श्री राम 

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श्रद्धा और विश्वास ही केवल

 

जो इंसान भगवान को जानता नहीं वो सिर्फ बोलता ही रहता है

लेकिन जो उसे जान लेता है फिर वो बोल ही नहीं पाता है

भगवान को जिसने देखा:-

भगवान को जिसने भी देखा उसका यही कहना था। दूसरे कितने भी भगवान के बारे में आपको बताये लेकिन आप नहीं जान पाएंगे उन्हें। भगवान को बातो से कभी नहीं समझा जा सकता , उनके बारे में जितना कहा जाये उतना कम है और जितना कहा जायेगा वो हमेशा अधूरा ही कहा जायेगा।

जो सिर्फ बातो से पूर्ण हो जाये वो पूर्ण परमात्मा सिर्फ इतना ही नहीं

कौन देख सकता है भगवान को ?

भगवान के बारे में आप जितना सुनेगे उतनी आपकी श्रद्धा बढ़ेगी ये सच है लकिन उनको आप जभी देख पाएंगे जब उनकी खुद आप पर कृपा होगी

भगवान को केबल बुद्धि से नहीं जाना जा सकता या पाया जा सकता है। क्यूंकि बुद्धि की पहुंच भगवान तक तो है ही नहीं अगर सिर्फ बुद्धि से भगवान मिल जाते तो इस दुनिया में बुद्धिवान की कोई कमी थोडा है। संसार में शातिर, चालक ,बुद्धिमान लोग तो भरे पड़े है।

सीधे साधे भक्त को वो तुरंत ही मिल जावै

रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक घटना :-

एक बार उन्होंने अपने अंधे मित्र को खाने पे बुलाया। वो अँधा इंसान बहुत प्रसन्न हुआ स्वामी जी से मिलकर। उन्होंने बहुत प्रकार के व्यंजन खिलाये। और कुछ देर बाद अंधे इंसान ने कहा ये चीज़ बहुत स्वादिस्ट है क्या है ये ?

स्वामी जी ने कहा ये खीर है। उसने कहा मित्र ये खीर कैसा होता है उन्होंने कहा सफ़ेद रंग का होता है उसने कहा मित्र ये सफ़ेद रंग वो कैसा होता है ? अब वो तो अँधा था उसे समझ नहीं आ रहा था।

तो स्वामी जी ने समझ।ने के लिए कहा वो तो बगुले के जैसा होता है फिर उसने पूछा ये बगुला कैसा होता है उन्होंने कहा वो टेढ़ा होता है तो फिर उस व्यक्ति ने कहा” अब समझा खीर टेढ़ी होती है। “

इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है जिसने ईश्वर को कभी देखा ही नहीं और जिसने देखा है वो चाहे कितने भी कोशिश कर ले वो अपना अनुभव किसी को बता नहीं सकता अगर बता भी दे तो समझा नहीं सकता। 

केबल आपकी श्रद्धा और विश्वास ही उसको आपके उसके सामने ला सकती है।

भक्त और भगवान

 

एक गांव में भोली-भाली गरीब लड़की पंजिरी रहती थी। वह भगवान मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। भगवान मदनमोहन भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे।वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ।

वह दूसरे दिन ही उन्हें वह चीज भेंट कर आती, पर वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती। वह रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती।

दूध वह नगर में दूसरे लोगों को भी देती। लेकिन मदनमोहन जी को दूध अपनी ओर से देती।उसके पैसे न लेती।

इस प्रकार वह दूध बेच कर अपनी जीवन नैय्या चलाती थी। लेकिन वह गरीब पंजिरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे मिलते कि दो वक्त का खाना भी खा पाये।

अतः मंदिर जाते समय पास की नदी से थोड़ा सा जल दूध में सहज रुप से मिला लेती । फिर लौटकर अपने प्रभु की आराधना में मस्त बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती।

कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं ,नित नए रुप में प्रकट होते,कभी प्रत्यक्ष में और वह पंजिरी संसार की सबसे धनी स्त्री हो जाती।

लेकिन एक दिन उसके सुंदर जीवन क्रम में रोड़ा आ गया। दूध में जल के साथ-साथ एक छोटी मछली दूध में आ गई और संयोगवश वह मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।

दूध डालते समय मंदिर के गोसाई की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने दूध वापस कर पंजिरी को खूब डांटा फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया।

पंजिरी पर तो आसमान टूट पड़ा ।रोती-बिलखती घर पहुंची-" ठाकुर मुझसे बड़ा अपराध हो गया ।क्षमा करो ,पानी तो रोज मिलाती हूं ,तुमसे कहां छिपा है ।ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो।

लेकिन, प्रभु आज तक तो तुमने कोई आपत्ति कि नहीं प्रेम से पीते रहे ,हां मेरा दोष था कि पानी छानकर नहीं मिलाया । लेकिन दुख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाई ने पानी मिलाने पर मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ ना बोले।

ठाकुर अगर यही मेरा अपराध है तो में प्रतिज्ञा करती हूं कि ऐसा काम आगे ना करूंगी और अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार न करोगे तो मैं यहीं प्राण त्याग दूंगी।

तभी पंजिरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया-"माई ओ माई ।उठी दरवाजे पर देखा तो द्वार पर एक सुदर्शन किंतु थका-हारा भूखा-प्यासा एक युवक कुटिया में झांक रहा है।

"कौन हो बालक"

मैया बृजवासी हूं मदन मोहन के दर्शन करने आया था। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए और रात भर सोने की जगह दे दो तो बड़ा आभारी रहूंगा।"

पंजिरी के शरीर में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। "कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है। ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मेरे जीवन में ऐसा जादू बिखेर दिया।दूर से आए हो क्या भोजन करोगे।"

"दूध के सिवा कुछ लेता नहीं ।तनिक दूध दे दो वही पी कर सो जाऊंगा।" दूध की बात सुनते ही पंजिरी की आंखें डबडबा आयी, फिर अपने आप को संभालते हुए बोली-

"पुत्र दूध तो है पर सवेरे का बासी है, जरा ठहरो अभी गाय को सेहला कर थोड़ा ताजा दूध दूह लेती हूं।"

"अरे मैया नहीं नहीं ।उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूं दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया ।अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दूहते रहना।"

डबडबायीआंखों से बोली" थोडा पानी मिला हुआ दूध है, पर उसमें मछली आ गई थी।" "अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या? जल्दी से कच्चा दूध छान कर ऐसे ही दे दो वरना मैं यही दम तोड़ दूंगा।"

पंजिरी को आश्चर्य हुआ कि कैसी बात कर बैठा यह युवक,दौड़ी-दौड़ी गई झटपट दूध दे दिया। इधर दूध पीकर युवक का चेहरा खिल उठा।

"मैया कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूं ही ना जाने क्या-क्या कह रही थी ,अब तो मेरी आंखों में नींद उतर आई है इतना कहकर युवक वही सो गया।

पंजिरी अकेली हो गई है तो दिन भर की कांति, दुख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आंखों में नींद कहां।

जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढा दी।

रात के अंतिम प्रहर जो आंख लगी कि कृष्ण कन्हैया को सामने खड़ा पाया।

मदन मोहन भगवान ने आज फिर से स्वप्न मे दर्शन दिए और बोले,"यह क्या मैया, मुझे को मारेगी क्या?

गोसाई की बात का बुरा मान कर रूठ गयी। खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने का कह रही हो।

मैंने तो आज तुम्हारे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर के कुछ खा पी ले और देख दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूं, उसी से मुक्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।

गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो, क्या हुआ?वह तो जल्दी हज़म हो जाता है।अब उठो और भोजन करो। पंजिरी हड़बड़ाकर के उठी देखा बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।

सचमुच भेस बदल कर कृष्ण कन्हैया ही कुटिया में पधारे थे। पंजिरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन को भोग लगाकर के साथ आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।

थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजिरी ने देखा कि कृष्ण कन्हैया उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।

इधर मंदिर के पट खुलते ही पुजारी ने मदन मोहनजी को देखा तो पाया की प्रभु फटी ओढ़नी ओडे़ आनंद के सागर में डूबे हैं। पुजारी समझ गये कि प्रभु तुमने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य मेरी समझ में नहीं आ रहा है।

लीलाउद्घाटन के लिए पंजिरी मंदिर के द्वार पर पहूंची। खड़ी होकर पुजारी जी से कह रही थी,"गुसाई महाराज देखो तो प्रभु की लीला और माया,पीतांबर मेरे घर छोड़ आये है और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।

कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था ,लेकिन भूखा प्यासा मेरा कन्हैया दूध के लिये घर आ गया।"

पुजारी देवी के सामने बैठ गए। "भक्त और भगवान के बीच मेंने क्या कर डाला ,भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला देवी मुझे क्षमा कर दो "पंजिरी के चरणों में रो-रो कर कह रहे थे पुजारी।

लेकिन उनका भक्ति सागर था जो भक्त में भगवान के दर्शन पाकर निर्बाध बह चला था।पंजिरी भी क्या कम भावावेश मे थी ।आनंद भक्ति के सागर मे हिलोरे लेती हुई कह रही थी।

"गुसाई जी देखी तुमने बाल गोपाल की चतुराई अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।लो भक्तों को सम्मान देना तो की पुरानी इनकी पुरानी आदत है।"

मूर्ति में विराजमान कन्हैया धीरे-धीरे मुस्कुरा कर कह रहे थे अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहां!!

जायफल के चमत्कारिक गुण

 

जानिए जायफल के चमत्कारिक गुण 

जायफल बहुत ही थोड़ी मात्र में गरम मसाले के अन्दर प्रयोग किया जाने वाला एक मसाला है। यह बहुत ही गुणकारी होता है। इसके औषधीय गुण इसे और महत्वपूर्ण बना देते हैं। एक जायफल कई बीमारियों में काम आता है। जैसे 

1. भूख नहीं लगती हो तो चुटकी भर जायफल की कतरन चूसिए। इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी, भूख बढ़ेगी और खाना भी ठीक से पचेगा।

2. जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से हृदय मजबूत होता है।

3. दांत में दर्द होने पर जायफल का तेल रुई पर लगाकर दर्द वाले दांत या दाढ़ पर रखें, दर्द तुरंत ठीक हो जाएगा। अगर दांत में कीड़े लगे हैं तो वे भी मर जाएंगे।

4. पेट में दर्द हो तो जायफल के तेल की 2-3 बूंदें एक बताशे में टपकाएं और खा लें। जल्द ही आराम आ जाएगा।

5. जायफल को पानी में पकाकर उस पानी से गरारे करें। मुंह के छाले ठीक होंगे, गले की सूजन भी जाती रहेगी।

6. जायफल को कच्चे दूध में घिसकर चेहरें पर सुबह और रात में लगाएं। मुंहासे ठीक हो जाएंगे और चेहरे निखारेगा।

7. एक चुटकी जायफल पाउडर दूध में मिला कर लेने से सर्दी का असर ठीक हो जाता है। इसे सर्दी में प्रयोग करने से सर्दी नहीं लगती।

8. कान के पीछे अगर सूजन हो या गांठ हो तो जायफल को पानी में घिसकर सूजन वाले स्थान पर लगाएं। सूजन ठीक हो जाएगी।

9. सरसों का तेल और जायफल का तेल 4:1 की मात्र में मिलाकर रख लें। इस तेल से दिन में 2-3 बार शरीर की मालिश करें। जोड़ों का दर्द, सूजन, मोच आदि में राहत मिलेगी।

10. फटी एड़ियों में जायफल को घिसकर बिवाइयों (दारों) में लगाएं, ठीक हो जाएंगी।

11. प्रसव के समय होने वाले दर्द से छुटकारा पाने के लिए जायफल को पानी में घिसकर, इसका लेप कमर पर करें, लाभ मिलेगा।

12. जायफल, सौंठ और जीरे को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को भोजन करने से पहले पानी के साथ लें। गैस और अफारा की परेशानी नहीं होगी।

13. दस जायफल लेकर देशी घी में अच्छी तरह सेंक लें। उसे पीसकर छान लें। अब इसमें दो कप गेहूं का आटा मिलाकर घी में फिर सेकें। इसमें शक्कर मिलाकर रख लें। रोजाना सुबह खाली पेट इस मिश्रण को एक चम्मच खाएं, बवासीर से छुटकारा मिल जाएगा।

14. नीबू के रस में जायफल घिसकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से गैस और कब्ज की तकलीफ दूर होती है।

रसोई का मसाला जायफल गुणकारी औषधि भी है.आयुर्वेद में जायफल को वात एवं कफ नाशक बताया गया है।

आमाशय के लिए उत्तेजक होने से आमाशय में पाचक रस बढ़ता है, जिससे भूख लगती है। आंतों में पहुंचकर वहां से गैस हटाता है। ज्यादा मात्रा में यह मादक प्रभाव करता है। इसका प्रभाव मस्तिष्क पर कपूर के समान होता है, जिससे चक्कर आना, प्रलाप आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

इससे कई बीमारियों में लाभ मिलता है तथा सौन्दर्य सम्बन्धी कई समस्याओं से भी निजात मिलती है।

- सुबह-सुबह खाली पेट आधा चम्मच जायफल चाटने से गैस्ट्रिक, सर्दी-खांसी की समस्या नहीं सताती है। पेट में दर्द होने पर चार से पांच बूंद जायफल का तेल चीनी के साथ लेने से आराम मिलता है।

- सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल को पानी में घिस कर लगाएं।

- सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन को मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये। यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।

- आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।

- दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।

- फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर जायफल को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की संभावना देखी गयी है।

- प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।

- फटी एडियों के लिए इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।

- जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।

- अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो जायफल को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये।

- अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है, तो जायफल को पानी में घिसकर उसे पिला दीजिये।

- जी मिचलाने की बीमारी भी जायफल को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।

- इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।

- यह शक्ति भी बढाता है।

- जायफल आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है।

- जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।

- किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार।

- बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को सुबह शाम चटायें।

- चेहरे पर या फिर त्वचा पर पड़ी झाईयों को हटाने के लिए आपको जायफल को पानी के साथ पत्थर पर घिसना चाहिए। घिसने के बाद इसका लेप बना लें और इस लेप का झाईयों की जगह पर इस्तेमाल करें, इससे आपकी त्वचा में निखार भी आएगा और झाईयों से भी निजात मिलेगी।

- चेहरे की झुर्रियां मिटाने के लिए आप जायफल को पीस कर उसका लेप बनाकर झुर्रियों पर एक महीने तक लगाएंगे तो आपको जल्द ही झुर्रियों से निजात मिलेगी।

- आंखों के नीचे काले घेरे हटाने के लिए रात को सोते समय रोजाना जायफल का लेप लगाएं और सूखने पर इसे धो लें। कुछ समय बाद काले घेरे हट जाएंगे।

- अनिंद्रा का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और इसका त्वचा पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। त्वचा को तरोताजा रखने के लिए भी जायफल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए आपको रोजाना जायफल का लेप अपनी त्वचा पर लगाना होगा। इससे अनिंद्रा की शिकायत भी दूर होगी और त्वचा भी तरोजाता रहेगी

- कई बार त्वचा पर कुछ चोट के निशान रह जाते हैं तो कई बार त्वचा पर नील और इसी तरह के घाव पड़ जाते हैं। जायफल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करें। जहां भी आपकी त्वचा पर पुराने निशान हैं रोजाना मालिश से कुछ ही समय में वे हल्के होने लगेंगे। जायफल से मालिश से रक्त का संचार भी होगा और शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी बनी रहेगी।

- जायफल के लेप के बजाय जायफल के तेल का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

- दांत में दर्द होने पर जायफल का तेल रुई पर लगाकर दर्द वाले दांत या दाढ़ पर रखें, दर्द तुरंत ठीक हो जाएगा। अगर दांत में कीड़े लगे हैं तो वे भी मर जाएंगे।

- पेट में दर्द हो तो जायफल के तेल की 2-3 बूंदें एक बताशे में टपकाएं और खा लें। जल्द ही आराम आ जाएगा।

- जायफल को पानी में पकाकर उस पानी से गरारे करें। मुंह के छाले ठीक होंगे, गले की सूजन भी जाती रहेगी।

- जायफल को कच्चे दूध में घिसकर चेहरें पर सुबह और रात में लगाएं। मुंहासे ठीक हो जाएंगे और चेहरे निखारेगा।

- एक चुटकी जायफल पाउडर दूध में मिला कर लेने से सर्दी का असर ठीक हो जाता है। इसे सर्दी में प्रयोग करने से सर्दी नहीं लगती।

- सरसों का तेल और जायफल का तेल 4:1 की मात्रा में मिलाकर रख लें। इस तेल से दिन में 2-3 बार शरीर की मालिश करें। जोड़ों का दर्द, सूजन, मोच आदि में राहत मिलेगी। इसकी मालिश से शरीर में गर्मी आती है, चुस्ती फुर्ती आती है और पसीने के रूप में विकार निकल जाता है।

- जायफल, सौंठ और जीरे को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को भोजन करने से पहले पानी के साथ लें। गैस और अफारा की परेशानी नहीं होगी।

- दस जायफल लेकर देशी घी में अच्छी तरह सेंक लें। उसे पीसकर छान लें। अब इसमें दो कप गेहूं का आटा मिलाकर घी में फिर सेकें। इसमें शक्कर मिलाकर रख लें। रोजाना सुबह खाली पेट इस मिश्रण को एक चम्मच खाएं, बवासीर से छुटकारा मिल जाएगा।

- नीबू के रस में जायफल घिसकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से गैस और कब्ज की तकलीफ दूर होती है।

- दूध पाचन : शिशु का दूध छुड़ाकर ऊपर का दूध पिलाने पर यदि दूध पचता न हो तो दूध में आधा पानी मिलाकर, इसमें एक जायफल डालकर उबालें। इस दूध को थोडा ठण्डा करके कुनकुना गर्म, चम्मच कटोरी से शिशु को पिलाएँ, यह दूध शिशु को हजम हो जाएगा


ओशो - जीन सुत्र २ प्रवचन

  


कहीं भी जाओ, मुझसे दूर न जा सकोगे। घर लौटो, तो भी मुझमें ही लौटोगे। यहां आओ, तो मेरे पास आओगे। न आओ, तो मेरे पास आओगे। फिर एक संबंध बनेगा, जो समय और स्थान के बाहर है। फिर एक सेतु जुड़ जाएगा, जो देहातीत है। लेकिन जब तक नहीं सुना है, तब तक बार-बार आना होगा। आने की तकलीफ उठानी होगी। अगर न उठानी हो तकलीफ तो जल्दी करो, चट्टान को टूटने दो। सुनो! सुनो ही मत, गुनो! हाथ ही मत देखो मेरा, उस तरफ देखो जिस तरफ हाथ इशारा कर रहा है। उस अदृश्य को पकड़ने की कोशिश करो। फिर तुम जहां भी होओगे, जैसे भी होओगे, कोई भेद मेरे और तुम्हारे बीच संबंध का न पड़ेगा। फिर मैं शरीर में रहूं, तुम शरीर में रहो, या न रहो, यह जोड़ कुछ ऐसा है कि टूटता नहीं। अभी तो लौटने में तकलीफ होगी। क्योंकि लौटकर जब तुम जाते हो, अकेले जाते हो, मुझे अपने साथ नहीं ले जाते। मैं चलने को राजी हूं। तुम अपने घर में मेरे लिए जगह ही नहीं बनाते। सुन लोगे मुझे, समझ लोगे मुझे, तो मैं साथ ही आ रहा हूं। मुझसे दूरी गयी, दुई गयी। फिर तुम मुझसे भरे हुए लौटोगे। जब तक ऐसा नहीं, तब तक तो बड़ी तकलीफ होगी। अभी बज्मेत्तरब से क्या उठूं मैं अभी तो आंख भी पुरनम नहीं है अभी इस खुशी की महफिल से तो मत उठाओ मुझे, अभी तो आंख भी गीली नहीं हुई। अभी बज्मेत्तरब से क्या उठूं मैं अभी तो आंख भी पुरनम नहीं है तो तुम्हें लगेगा जैसे बे-समय, असमय तुम्हें उठा दिया गया है। ऐसा लगेगा जैसे अभी जाना न था और जाना पड़ा। और अगर ऐसे तुम गये, तो घर और भी उदास हो जाएगा। जितना पहले था, उससे भी ज्यादा। मैं तुम्हारे घर को उदास नहीं करना चाहता। मैं तुम्हारे घर को मंदिर बनाना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि तुम जब घर जाओ, तो तुम्हारे घर का अभिनवरूप प्रगट हो। मैं तुम्हें घर से, संसार से, गृहस्थी से तोड़ नहीं लेना चाहता। वही मेरे संन्यास का अभिनवपन है कि मैं तुम्हें संसार से तोड़ नहीं लेना चाहता। मैं तुम्हें संसार से इस भांति जोड़ देना चाहता हूं कि संसार का जोड़ ही परमात्मा से जोड़ बन जाए। संसार तुम्हारे और परमात्मा के बीच बाधा न रहे, साधक हो जाए। अगर तुम मुझे ले जा सको–थोड़ा-सा ही सही, थोड़ा-सा वातावरण मेरा, थोड़ी-सी रोशनी मेरी, थोड़ी-सी श्वासें मेरी–तो घर तुम जाओगे, वही घर नहीं जिसे तुम छोड़कर आये थे। पत्नी-बच्चे तब तुम्हें पत्नी-बच्चे ही न रह जाएंगे, उनमें भी तुम परमात्मा की झलक देख पाओगे। देख ली जिसने परमात्मा की जरा-सी झलक, फिर वह सभी जगह उसे देख पाता है। पत्थर में देख पाता है, तो पत्नी में न देख पायेगा! पत्थर में देख पाता है, तो पति में न देख पायेगा! अब कैसे मजे की घटना है कि लोग जीवंत व्यक्तियों को छोड़कर भागते हैं और पत्थरों में भगवान को देखते हैं। तुम्हें यहां न दिखा, तुम्हें पत्थर में कैसे दिखायी पड़ेगा! और जिसको पत्थर में दिख सकता है, वह भागेगा क्यों? क्योंकि उसे सब जगह दिखायी पड़ेगा। दृष्टि अगर वस्तुतः जन्मी हो, तो तुम मुझे छोड़कर जाओगे ही नहीं। मैं तुम्हारा आकाश हो जाऊंगा। मैं तुम्हें घेरे हुए चलूंगा। और तभी तुम मुझसे जुड़े। तभी तुम मेरे संन्यासी हुए। अन्यथा संबंध बुद्धि का रहेगा। और तब बार-बार अड़चन होगी। जब-जब तुम्हें जाना पड़ेगा–और जाना तो पड़ेगा ही। जिम्मेवारियां हैं। जाना तो पड़ेगा ही, दायित्व हैं। जाना तो पड़ेगा ही, तुमने बहुत से भरोसे दिये हैं, आश्वासन दिये हैं। जाना तो पड़ेगा ही, क्योंकि परमात्मा ने तुम्हें कुछ करने के लिए काम दिया है। वह काम तो पूरा करना होगा। भगोड़ापन मैं नहीं सिखाता हूं। भगोड़े मेरे लिए संन्यासी नहीं हैं। भगोड़े में कुछ कमी है। भगोड़ा संसार में परमात्मा को न देख पाया, अंधा है। भगोड़ा वहां से भाग गया, जहां जीवन-रूपांतरण होता, जहां क्रांति घट सकती थी, जहां चुनौती थी। नहीं, मैं तो तुम्हें वापिस भेजूंगा। तुम्हारी आंख गीली हुई हो या न हुई हो, तुम्हें जाना तो होगा। जब जाना ही है, तो मुझे पीकर जाओ। आंख गीली क्या, हृदय को गीला करके जाओ। और तुम्हारे हाथ में है। अगर तुम प्यासे लौटते हो, तो कोई और जिम्मेवार नहीं है। तुम मुझे दोष न दे सकोगे। नदी बह ही रही थी, तुम झुके नहीं। तुमने अंजुलि न बनायी। तुमने नदी से पानी न भरा। तुम शायद प्रतीक्षा करते थे कि नदी अब तुम्हारे कंठ तक भी आये। नदी तुम्हारे पास से बह रही थी, लेकिन झुकने की तुमने हिम्मत न दिखायी। केवल हिम्मतवर झुक सकते हैं। समर्पण केवल वे ही कर सकते हैं, जिनके पास महासंकल्प है। जो बड़े बलशाली हैं, वे ही केवल झुकने की हिम्मत दिखा पाते हैं। कमजोर तो डरा रहता है कि झुकने से कहीं कमजोरी का पता न चल जाए। अड़ा रहता है, अकड़ा रहता है। 


ओशो - जीन सुत्र २ प्रवचन 35


Sab kuch

मूलाधार चक्र हीलिंग।

  https://youtu.be/APq3mCgb3fM?si=D1nkuyqimWfZXSyp ये वीडियो जरूर देखें, मूलाधार चक्र हीलिंग का है ,रात को सोने से पहले जरूर देखें बहुत पावर...